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Wednesday, 1 April 2020

सरकारें चाहें तो कुछ भी कर सकती हैं पर करती क्यों नहीं? क्योंकि आप नहीं चाहते!

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'सरकार कर तो रही है और कितना करे?इतनी बड़ी आबादी में फैसले लेने कोई आसान काम नहीं है। ये सभी बेवकूफ लोग हैं जो गांव भाग रहे हैं, इतनी जल्दी तो भूखा कोई नहीं मरता, सरकार सबके लिए खाने का इंतजाम कर तो रही है, टाइम लगता है''इसी तरह की बेतुकी दलीलें दी जा रही हैं कुछ पत्रकारों और सरकार के समर्थकों की तरफ से....वैसे ये सरकारें इन्हीं लोगों के लिए इन्हीं के वोट से बनाई जाती हैं...यही कम पढ़े-लिखे लोग किसी पढ़े लिखे को चुनते हैं जिससे वो इनके लिए, जो सही हो, या इन्हें ध्यान में रखकर फैसले लें लेकिन सभी सरकारें फैसले लेते वक्त इन्हें ही भूल जाती हैं...जबकि वोट दें ये, भूखे रहें ये, लाठी खाएं ये और बदनाम हों तो भी यही लोग।
लॉक डाउन हुआ तो फैक्ट्री,कंपन्नियां बंद हुईं और जब ये घर जाने लगे तो ट्रेन,बस सब बंद...कितने ही दिनों से ये सड़कों पर हैं अब जब शोर मचा तो बसें चला दी गईं, ट्रेन अब भी  बंद हैं अगर इन्हें ध्यान में रखकर फैसला लिया होता तो जैसे चीन और इटली से पूरे खतरे के साथ लोगों को एयर लिफ्ट किया था, उनकी स्क्रीनिंग कर, 14 दिन आइसोलेशन में रखकर देश में उनके घर जाने दिया वैसे ही इन मजदूरों के साथ भी किया जा सकता था....इस पर कई लोग कह रहे हैं कि इतने लोगों को 14-15 कहां रखा जाए,कैसे इनकी जांच हो? 


तो आपको अगर कुंभ का मेला याद हो तो उसकी तैयारी भी याद होंगी जिसकी पूरी दुनिया में तारीफ हुई थी....सरकार दिल्ली,नोएडा,गाजियाबाद कहीं भी एक कैंप लगा सकती है और कुंभ की तैयारी जिन लोगों ने की थी उन्हें इसमें लगाया जा सकता है...सरकारें चाहे तो कुछ भी कर सकती हैं नहीं यकीन है तो चुनाव का वक़्त याद कर लीजिए किसी बड़े नेता का चुनाव का मंच 4 घंटे में तैयार हो जाता है वो भी AC लगा हुआ।लेकिन क्या जरूरत है सरकार को भी अस्पताल बनवाने की जब हम मंदिर मस्जिद से ही खुश हैं। अब 
सरकार की प्राथमिकता देखिए, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर प्रेस कॉफ्रेंस कर कहते हैं कि दर्शकों की मांग पर हमने रामयण शुरू की है...मीडिया इस खबर को प्रमुखता देता है, फिर कुछ लोग मांग करते हैं कि महाभारत भी दिखाया जाए...मंत्री जी फिर सुन लेते हैं और महाभारत का भी प्रसारण शुरू हो जाता है हम जैसे लोग सवाल उठाते हैं तो सरकार के समर्थक कहते हैं कि आपको रामायण से क्या दिक्कत है?अरे भई रामायण से नहीं, सरकार की प्राथमिकताओं से दिक्कत है?जो कुछ दिन बाद तुम्हें भी होगी जब जान पर बन आएगी।

Saturday, 4 January 2020

गुड न्यूज़ वो फिल्म जो आपको हंसाते हुए संवेदनशील बना जाएगी


ऑफिस में एक महिला साथी जो 8 महीने की प्रेगनेंट थी...अपनी बात किसी से कह रही थी कि इन दिनों में हमें बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी होती है सोने में, क्योंकि हम करवट नहीं ले सकते, हमें पूरी रात पीठ के बल ही सोना पड़ता है, उस वक्त काम में ध्यान था तो बात कानों तक ही पहुंच कर रह गई दिल तक नहीं पहुंची...लेकिन सोते वक्त वो बात याद आई और याद आया वो सकून, जो मिलता है बहुत देर एक ही करवट लेटने के बाद करवट बदलने पर।

कल जब फिल्म goodnewzz देखी जिसमें करीना कपूर अक्षय कुमार को बताती हैं कि एक बच्चे के जन्म में एक औरत कितना और क्या-क्या झेलती है और उसमें एक पुरुष का क्या योगदान होता है?वैसे आप मजाक में कुछ भी कह लें, कितनी भी मर्दानगी दिखा लें लेकिन एक बच्चे के जन्म में एक पुरुष का योगदान महज 1 प्रतिशत ही होता है और बच्चे को 9 महीने पेट में रखने,उसे जन्म देने और उसे पालने में एक महिला की पूरी जिंदगी खप जाती है...और बावजूद इसके आदमी के मुंह से अक्सर, ये मेरा खून है,मेरा वारिस है, मेरे वंश को आगे बढ़ाएगा जैसी बातें ही सुनने को मिलती हैं...खैर ये फिल्म अपनी जबरदस्त कॉमेडी के लिए तो जानी ही जाएगी लेकिन उस जरूरी मैसेज के लिए भी जानी जाएगी जो दिया है करीना कपूर और कियारा के किरदारों ने जिसमें दोनों ने बेहद बारीकी से प्रेगनेंशी के दौरान होने वाली परेशानियों और उस दौरान एक महिला के इमोशंस को पर्दे पर उतारा है...ये फिल्म एक बार सभी को जरूर देखनी चाहिए खासकर लड़कों को, जिससे वे अपने आस-पास मौजूद लड़कियों और महिलाओं को और अच्छे से समझ सकें निश्चित ही जब वे फिल्म देखकर बाहर निकलेंगे तो कुछ संवेनशील होकर निकलेंगे जो इस मशीनी होते दौर में बेहद जरूरी भी है।

Friday, 6 December 2019

सुनिए..मुख्यमंत्री जी उन्नाव की बेटी आपसे कुछ कहना चाहती है...


तालियों का शोर थोड़ा कम कीजिए...मैं एक सवाल पूछना चाहती हूं...उन न्यायाधीश से जिनसे मैंने बारबार कहा कि मेरी जान को खतरा फिर भी आपने उन आरोपियों को जमानत क्यों दी?
एक सवाल उस पुलिस से जो एनकाउंटर में माहिर है तो उसके होते हुए मेरा एनकाउंटर कैसे हो गया?
और एक आखिरी सवाल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से कि आपके होते हुए एक ही जगह पर दो-दो घटनाएं कैसे हो जाती हैं?और लड़की को बलात्कार के बाद FIR लिखवाने के आत्मदाह की धमकी क्यों देनी पड़ती है?अगर उस वक़्त आप अपने विधायक को बचाने की जगह उस लड़की के साथ खड़े होते तो मैं जिंदा होती...

वैसे तो ये सवाल मीडिया को पूछने चाहिए लेकिन वो सब तो ताली बजाने में व्यस्त हैं...उन्हें लगता है कल एनकाउंटर से सब सुधर चुका है...इसलिए मुझे पूछने पड़ रहे हैं...और आप ये सोचकर चुप मत रहना कि मैं तो रही नहीं तो जवाब कौन सुनेगा...अब आपसे जवाब हर ज़िंदा लड़की को चाहिए...अभी भले ही तालियों का शोर है लेकिन जैसे-जैसे ये शोर कम होगा आपसे सवाल पूछे जाएंगे.. इसलिए तैयारी कर लीजिए मुख्यमंत्री जी।

Wednesday, 17 July 2019

लड़की नहीं भाग रही हैं बल्कि समाज इतना धीमे चल रहा है कि उसे हर हक मांगती लड़ती भागती हुई दिख रही है...


साक्षी और अजितेश के मामले में लोगों की वो सोच सामने आ रही है जिसमें किसी की झूठी शान और इज्जत किसी की जान से ज्यादा बढ़कर मानी जा रही है।और दुख इस बात का है कि इस सोच में नई पीड़ी भी शामिल है।सभी को लड़की ही गलत लग रही है, सभी को वो लड़की परिवार के खिलाफ बागी लग रही है लेकिन ‘’बगावत हमेशा बंधन के खिलाफ होती है, डर के खिलाफ होती है, विश्वास के खिलाफ बगावत कभी नहीं होती’’ एक लड़की का घर से भाग जाना समाज के लिए कितनी बड़ी बात हो जाती है? एक परिवार के लिए कितनी शर्म की बात हो जाती है, लेकिन एक लड़की जब भागने का फैसला लेती है तो उसके पीछे डर होता है मौत का, उसे पता है कि अगर वो नहीं भागी तो उसके घरवालों का प्यार जाति से प्यार के सामने बौना हो जाएगा।अहमदाबाद का रहने वाले हरकेश सिंह ने उर्मिला के साथ जिंदगी बिताने और मौत से बचने के लिए 181 नंबर की हेल्पलाइन से मदद मांगी। काउंसलर ने उर्मिला के मां बाप को समझाया भी लेकिन जैसे ही उर्मिला के पिता दशरथ सिंह को पता चला कि बाहर गाड़ी में हरकेश भी है, वे अपने रिश्तेदारों के साथ बाहर आए और हरकेश सिंह को गाड़ी से उतारकर मार दिया। सोचिए पुलिस के सामने मार दिया।आज ऐसी न जाने कितनी ही खबरें आए दिन अखबारों में पढ़ने को मिलती रहती हैं, उन पर एक अजीब सी खामोशी छाई रहती है।वीडियो वायरल होने के बावजूद, पूरा मामला मीडिया में छाने के बावजूद साक्षी और अजितेश पर हमला हो जाता है और वो भी कोर्ट परिसर में सोचिए कितनी सुरक्षित है एक लड़की? दरअसल एक लड़की जो जिंदा है, बोल रही है लोगों को दिक्कत हो रही है। साक्षी मिश्रा उर्मिला की तरह नहीं थी।साक्षी ने अपने विधायक पिता राजेश मिश्रा पर भरोसा नहीं किया। दरअसल कुछ लोगों को दिक्कत ये है कि एक लड़की टीवी पर बैठकर जातिवादी समाज के खिलाफ बोल कैसे रही है उस पारिवारिक ढांचे पर चोट कैसे कर रही है?जिसमें घर की, समाज की सबकी इज्जत का ढेका एक लड़की ही उठाती है,पहले एक घर को घर बनाती है और फिर उसकी मर्जी पूछे बिना उसे किसी और घर पहुंचा दिया जाता है, वो उसे भी अपना घर बना लेती है, ये जानते हुए भी कि उसके घर के बाहर भी कभी उसके नाम की नेम प्लेट तक नहीं लगेगी।ऐसी लड़की जब खुलेआम बोलेगी तो इस समाज को दिक्कत तो होगी ही, ऐसी लड़की की तो तस्वीर टंगी होनी चाहिए थी फूल माला के साथ, और तब टीवी वाले भी उसके फोटो के साथ खबर चलाते ऑनर किलिंग की एक और शिकार, तब ना किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचती न हमारी संस्कृति का इतना नुकसान होता जैसा अब हुआ है।दरअसल लड़की नहीं भाग रही हैं बल्कि समाज इतना धीमे चल रहा है कि उसे हर हक मांगती लड़ती भागती हुई दिख रही है।

Sunday, 23 June 2019

कबीर सिंह सिर्फ पर्दे पर देखने के लिए है,रीयल लाइफ में कबीर सिंह ना होता है और ना होना चाहिए...

हाल ही में रिलीज हुई फिल्म #KabirSingh की तारीफ भी हो रही है और आलोचना भी...तारीफ होनी ही चाहिए क्योंकि इस फिल्म में शाहिद कपूर ने गजब की एक्टिंग की है...उनकी ऐनर्जी, उनका गुस्सा और वो सारी चीज़ें जो इस किरदार के लिए ज़रूरी थीं, उन सब चीज़ों पर शाहिद ने निश्चित तौर पर मेहनत की और वो स्क्रीन पर दिखती भी हैं...इसी तरह की एक्टिंग रितिक रोशन भी करते नजर आते हैं...कियारा खूबसूरत लगी हैं और क्लाईमेक्स में एक्टिंग भी दिखा जाती हैं।
वैसे ये समीक्षा लिखने की वजह फिल्म का अच्छा या बुरा होना नहीं है...वो तो आप फिल्म देखकर खुद ही तय कर लेंगे...ये लिखने की वजह है, कि आखिर कबीर सिंह चाहिए किसे...कौन चाहेगा कि उसका कबीर सिंह जैसा बेटा हो, जिसे गुस्सा काबू करना नहीं आता हो। कौन चाहेगा कि उसका कबीर सिंह जैसा भाई हो...जो अपने बड़े भाई पर हाथ उठा देता हो...कौन वो लड़की होगी जो चाहेगी कि उसका कबीर सिंह जैसा बॉयफ्रैंड या पति हो जो लड़की जिसे वो प्यार करता है उसे अपनी प्रॉपर्टी समझता हो...और खुद से अलग उस लड़की का वजूद ही नहीं मानता हो...इंटरवल से पहले कबीर सिंह का क्यारा को थप्पड़ मारकर ये कहना कि तुम जो भी हो मेरी वजह से हो, कहना अखरता है...हो सकता कुछ लड़कियों को इस तरह के प्रेमी पसंद आते हों...जो लड़की को मारकर अपने प्यार का सबूत देते हों...वैसे प्यार तो कोई भी कर लेता है लेकिन इज़्ज़त देने वाले कम ही मिलते हैं।

एक सलाह उन नए 'कबीरों' को जो फिल्म देखकर कबीर सिंह जैसा बनने की सोच रहे होंगे...कि कबीर सिंह सिर्फ पर्दे पर देखने के लिए ही है, बस रील लाइफ में ही अच्छा लगता है, रीयल लाइफ में कबीर सिंह ना होता है और ना होना चाहिए...फिल्म के अंत में कबीर सिंह भी सुधर जाता है तो अगर आखिर में सुधरना ही है तो क्यों कबीर सिंह बनकर अपनी जिंदगी का कुछ खूबसूरत हिस्सा खराब करना। अब अंत में इस फिल्म से जुड़ी सबसे खूबसूरत चीज... और वो हैं दादी जो बेहद लाउड फिल्म में ठंडी हवा के झोंके की तरह आती हैं...और उनकी एक बात जो फिल्म देखकर निकलने के बाद से अब तक याद है..

''आप किसी को खुश करने की कोशिश में उसका दुःख नहीं बाँट सकते...हर किसी को अपने कष्ट खुद ही सहने पड़ते हैं''

Sunday, 23 December 2018

गुनहगार छूट रहे हैं...न्याय देवी को अपनी आंखों पर बंधी पट्टी खोलने का वक्त आ गया है


जब न्याय देवी की आंखों पर पट्टी बांधी गई होगी तो शायद उस समय ये मंशा रही होगी कि कानून अपने लंबे हाथों से सबूत लेकर आएगा और अदालतों में बैठे न्यायधीश आंखे बंद कर निष्पक्ष होकर फैसला सुनाएंगे। लेकिन अब कानून के हाथ छोटे होते जा रहे हैं और अब वक्त आ गया है कि न्याय देवी को पट्टी खोल देनी चाहिए नहीं तो जैसे 13 साल चले हिंट एंड रन केस के आरोपी छूट गए, आरुषि को किसने मारा ये आज तक पता नहीं पता चल सका,2G स्पेक्ट्रम के आरोपी बरी हो गए और अब सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस में सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया गया और अगर ये पट्टी नहीं खोली गई तो ऐसे सबूतों के कमी के चलते गुनहगार छूटते रहेंगे, फिर से गुनाह करने के लिए।
फैसला के वक्त जज द्वारा कही बात जजों की मजबूरी दिखाती है। सीबीआई के जज एसजे शर्मा ने कहा, ''मैं मारे गए तीन लोगों के परिवार के लिए बुरा महसूस कर रहा हूं, लेकिन लाचार हूं। अदालत सबूतों के आधार पर फ़ैसला करती है...दुर्भाग्य से इस केस में सबूत ग़ायब हैं.''
निश्चित ही सबूत जमा करना अदालतों का काम नहीं है ये काम पुलिस का है और पुलिस पर राजनैतिक दवाब कितना होता है ये किसी से छिपा नहीं है। क्या ये भद्दा मजाक नहीं है कि इतने साल हुई सुनवाई के दौरान करीब 200 गवाह पेश किए गए और इसमें से 92 गवाह मुकर गए।
इनमें से एक गवाह का नाम है आजम खान, जिसका कहना है कि राजस्थान पुलिस उस पर दबाव डाल रही है. आजम खान का आरोप है कि सोहराबुद्दीन शेख, गुजरात के पूर्व मंत्री और नरेंद्र मोदी के आलोचक हरेन पांड्या की हत्या में शामिल थे और उन्होंने ये हत्या गुजरात पुलिस अफसर डीजी बंजारा के कहने पर की।
इस मामले में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह मुख्य आरोपियों में से एक थे. एनकाउंटर के समय गुजरात के गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया का नाम मुख्य आरोपी में शामिल था. लेकिन कुछ साल बाद उन्हें क्लीनचि‍ट दे दी गयी. हाल ही में गृह मंत्रालय ने सोहराबुद्दीन मामले की जांच करने वाले गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी रजनीश राय को सस्पेंड कर दिया।
ये सस्पेंशन हैरान करने वाला है, क्योंकि ये वही राय हैं जिन्होंने इस मामले में 3 आईपीएस अधिकारी डीजी वंजारा, गुजरात कैडर के राजकुमार पांडियन और राजस्थान कैडर के दिनेश एमएन को गिरफ्तार किया था

दूर से देखेंगे तो सबकुछ सामान्य दिखेगा राय का निलंबन भी, आरोपियों का छूटना भी, क्योंकि मीडिया में सबकुछ सामान्य बना दिया गया है। लेकिन 92 गवाहों का अपनी गवाही से मुकर जाना सामान्य बात नहीं है। और जजों का पीड़ितों के लिए सिर्फ बुरा महसूस करना काफी नहीं है बल्कि ये लाचारी है सिस्टम की, ये लाचारी है उस पुलिस की जो राजनैतिक दवाब से आजाद ही नहीं होना चाहती और अक्सर उसी का शिकार बन जाती है और कहीं कोई सुबोध भीड़ के लिए भीड़ के हाथों शहीद कर दिया जाता है। 

Saturday, 22 December 2018

केदारनाथ:एक खूबसूरत फिल्म जो अफवाह का शिकार हुई...


पता नहीं कहां से ये अफवाह उड़ी कि फिल्म केदारनाथ में मंदिर के सामने किसिंग सीन फिल्माया गया है और लोगों ने बिना देखे ये चर्चा शुरू कर दी कि फिल्म में कुछ गलत है।उत्तराखंड में कई जिलों में फिल्मों को बैन कर दिया गया। लेकिन फिल्म देखकर अंदाजा हुआ कि सारी समस्या बिना देखे,बिना सुने प्रतिक्रिया देने की है।
काय पो छे बनाने वाले Abhishek Kapoor की फिल्म शुरू से आखिर तक बांधकर रखने वाली है। Sushant Singh Rajputऔर sara ali khan की एक्टिंग कमाल की है। इंटरवल से पहले की फिल्म जहां उत्तराखंड की खूबसूरती बयां करती है तो वहीं इंटरवल के बाद 5 साल पहले आई बाढ़ के सीन डरा देने वाले हैं।जिसमें करीब 4 हजार लोग मारे गए थे और 70 हजार से ज्यादा लोग लापता हुए थे, और इस सब के बीच एक खूबसूरत प्रेम कहानी भी पनपती है मुस्लिम लड़के और हिंदू लड़की की कहानी, और बस यही वजह है फिल्म के विरोध की जिसे लव जेहाद के नाम पर प्रचारित किया गया,और ये सब किया गया संस्कृति बचाने के नाम पर जबकि सही में उत्तराखंड की संस्कृति बचाने की कोशिश की गई होती तो शायद ये आपदा ही नहीं आती। मेरा एक साथी जो सिर्फ इस वजह से फिल्म देखने नहीं गया कि उसने किसी से सुना था कि मंदिर के सामने किसिंग सीन फिल्माया गया है, को जब मैंने बताया कि फिल्म बहुत अच्छी है और आखिर में मुस्लिम लड़का हिंदू लड़की और उसके बाप को बचाने के लिए अपनी जान देता है, तो वो बोला ऐसा कहीं होता है क्या? ये तो बस कहानी है सच में कहां होता है?
शायद वो सही था ये बस कहानी है और वो किसिंग सीन सच है, वो कहानी का हिस्सा नहीं है।समझ नहीं आता कि ये नफरत खत्म क्यों नहीं होती इतनी बड़ी-बड़ी आपदाएं आई हैं इस नफरत को अपने साथ बहाकर क्यों नहीं ले जातीं?
पता नहीं हम सब दूसरों की कही बात का इतनी जल्दी विश्वास क्यों कर लेते हैं, अपनी नजर को कम क्यों आंकते हैं? क्यों चीजों को खुद देखकर फैसला नहीं करते? बकौल साहिर लुधियानवी


ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र ही तो है
क्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम