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Saturday, 28 April 2018

अब जब आप लाल किला घूमने जाएंगे तो शायद आपसे पूछा जाए WOULD YOU LIKE.....



सरकारें निजीकरण को विकास का पैमाना मानती आई हैं। उन्हें लगता है कि हर चीज का विकास निजी हाथों में पहुंच कर ही होता हैशायद इसीलिए देश में पहली बार किसी ऐतिहासिक इमारत को निजी हाथों में पहुंचाने का काम किया गया है। हालांकि अभी लालकिले को 5 साल के लिए दिया गया है लेकिन अक्सर इस तरह के बदलाव पिछले दरवाजे से ही होते हैं। कहा जा रहा है कि सरकार ने लालकिले को नए सिरे से विकसित करने के लिए ये कदम उठाया है। लेकिन पुरानी और ऐतिहासिक चीजों को फिर से विकसित करने की नहीं संरक्षण की जरूरत होती है..और संरक्षण का काम तो सरकार खुद कर ही सकती है। और ये सरकार की गोद लेने वाली योजना तो समझ से परे है कौन आदमी, कौन सी कंपनी किसी चीज को गोद लेने के लिए पैसे देती है? फिर चाहे वो प्रधानमंत्री के कहने पर गांव गोद लेने वाले सांसद हों या बच्चे को गोद लेने की चाह रखने वाले दंपति। इसकी जगह अगर प्रधानमंत्री देश के बड़े उद्योग घरानों के मालिकों को लालकिले और ताजमहल जैसी इमारतों को गोद लेने की अपील करते और राजस्थान में भामाशाहोंके सम्मान की तर्ज पर उन सभी का लाल किले की देखभाल के लिए उसी लाल किले से सम्मान करते। लेकिन यहां सरकार ने डालमिया से 25 करोड़ की डील की क्योंकि मौजदा सरकार व्यापार में ज्यादा भरोसा करती है और डालमिया ग्रुप के सीईओ महेंद्र सिंघी ने कहा भी है कि हर पर्यटक हमारे लिए एक कस्टामर होगा

खैर अब जो होगा वो ये कि अब आने वाले 15 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी एक ठेके पर दी हुई इमारत से देश को संबोधित करेंगे और विकसित करने के नाम पर लालकिले में पर्यटकों को कंपनी कुछ सुविधाएं देगी और उसकी मनमानी कीमत वहां आने वाले पर्यटकों से वसूली जाएगी। ठीक वैसे ही जैसे निजी बैंक वसूलते हैं जी सर, कैसे हैं सर, WOULD YOU LIKE A CUP OF TEA  टाइप मीठी बातों के लिए और इसके बदले में एक बचत खाता 5000 रुपये से खोला जाता है और वही बचत खाता सरकारी बैंक में 1000, 500 या जीरो बैलेंस पर ही खुल जाता है। बस सरकारी बैंक में कोई आपका नकली मुस्कराहट के साथ स्वागत करने के लिए नहीं होता। हो सकता है कुछ दिनों बाद जब आप लालकिला घूमने जाएं तो कोई मुस्कराता हुआ चेहरा आप से पूछे WOULD YOU LIKE.....

Friday, 27 April 2018

आप रेप के आरोपी हैं? कोई बात नहीं हम आपके समर्थन में रैली निकालेंगे और आपको बचा लेंगे..




देश में एक नई और गलत प्रथा शुरू होती जा रही है….ये प्रथा है आरोपियों को बचाने की प्रथाआरोपियों को बचाने के लिए उनके समर्थन में रैली निकालने और प्रदर्शन करने की प्रथा….कठुआ में 8 साल की बच्ची के साथ हुई हैविनयत के बाद आरोपियों के समर्थन में तिरंगे के साथ रैली निकाली गई और रैली में वंदे मातरम के नारे भी लगाए गएठीक वैसे ही उन्नाव में भी आरोपी बीजेपी विधायक के समर्थन में रैली निकाली गई…. इस दौरान रैली में लोग बड़े-बड़े बैनर लिए हुए थे, जिन पर लिखा था, ‘हमारा विधायक निर्दोष है।
रैली में महिलाओं से लेकर सैकड़ों पुरुषों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लियाजिसका नेतृत्व नगर पंचायत अध्यक्ष अनुज कुमार दीक्षित ने किया। दीक्षित ने इस बारे कहा, “यह हमारे विधायक को बदनाम करने की राजनीतिक साजिश है।

कठुआ मामले में भी हिंदू एकता मंच ने आरोपियों के समर्थन में रैली निकाली थी जिसमें जम्मू-कश्मीर सरकार में बीजेपी के दो मंत्री चौधरी लाल सिंह और चंद्र प्रकाश गंगा भी इस रैली का हिस्सा थे।

यहां बड़ा सवाल ये उठता है कि अगर बीजेपी नेताओं को अपनी पुलिस पर भरोसा नहीं है तो फिर उसके मंत्री महबूबा मुफ्ती की सरकार में क्या कर रहे हैं। हर किसी को पुलिस की जांच पर शक होता है, हिन्दुस्तान भर की पुलिस की विश्वसनीयता भी यही है तो भी क्या भीड़ तय करेगी कि वह क्या करे और उसके पीछे हिन्दू मुस्लिम का तर्क खड़ा किया जाएगा? क्या एक आठ साल की बच्ची की हत्या और बलात्कार के आरोपियों के पक्ष में भारत माता की जय के नारे लगेंगे?

अगर इसी तरह आरोपियों और अपराधियों को बचाने के लिए रैली निकाली जाती रही तो हो सकता है कि आरोपी बच जाएं लेकिन एक समाज के तौर हम आने वाली पीढ़ियों के दोषी तो बन ही जाएंगे जिसके लिए वे हमें शायद कभी माफ ना कर पाएं....

Saturday, 31 March 2018

कोबरा पोस्ट का स्टिंग : मीडिया से 'पत्रकारिता' के सवाल और मीडिया खामोश!




एक ऐसे दौर में जब माफिया टाइप नेता पत्रकारों (सिर्फ पत्रकारों से) से डरे हुए हैं और खुद के डर को कम करने के लिए वे पत्रकारों की हत्या करवा रहे हैं…और मरने वाले पत्रकार की खबरें मीडिया में जगह भी नहीं बना पा रही हैं। तब कोबरापोस्ट के पत्रकार का अपनी जान जोखिम में डालकर बिकाउ मीडिया संस्थानों का सच सामने लाना निश्चित ही काबिले तारीफ है। इस स्टिंग से पता चलता है कि पैसों के लिए देश का मीडिया अपनी आवाज और कलम का भी सौदा कर सकता है।
कोबरापोस्ट के पहले पार्ट में जिन 17 मीडिया संस्थानों के नाम आए उनमें इंडिया टीवी, दैनिक जागरण, अमर उजाला, पंजाब केसरी, हिन्दी खबर, SAB ग्रुप, DNA, 9X टशन, UNI, समाचार प्लस, HNN 24×7, स्वतंत्र भारत, scoopwhoop, Rediff.com, इंडिया वॉच, आज (हिन्दी दैनिक), साधना प्राइम न्यूजशामिल हैं। इन सभी को सौदेबाजी में लिप्त पाया गया है। इन सभी मीडिया संस्थानों से जुड़े बड़े पदों पर काबिज लोगों की बातचीत इस स्टिंग ऑपरेशन में दिखाई गई है


वीडियो में आप देखेंगे कि ये पैसे के लिए सत्ताधारी दल के पक्ष में चुनावी हवा (लोकसभा चुनाव 2019) तैयार करने के लिए राजी होते नजर आए हैं। इसके अलावा, विपक्ष और विपक्षी दलों के बड़े नेताओं का दुष्प्रचार करके चरित्र हनन करने और उनके खिलाफ झूठी अफवाहें फैलाकर उनकी छवि को खराब करके, सत्ताधारी दल के पक्ष में माहौल बनाने की सौदेबाजी का भी खुलासा हुआ है।

वीडियो में देखेंगे कि ये राहुल गांधी को पप्पू, मायावती को बुआ/बहन जी, अखिलेश को बबुआ जैसे शब्दों से संबोधित कर खबर चलाने के लिए तैयार हैं। ऐसा इसलिए ताकि बार-बार ऐसे शब्दों का प्रयोग करते रहने पर जनता इन्हें गंभीरता से लेना छोड़ दे। आपने सोशल मीडिया पर फेकू नाम से प्रसिद्ध नरेंद्र मोदी को किसी टीवी या अखबार की हेडलाइन में फेकू शब्द कितनी बार देखा है? जिस तरह ये मीडिया घराने कुछ भी दिखाने के लिए तैयार हो गए। उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि ये पैसे के लिए दंगे भी करवाने के लिए तैयार हो सकते हैं।
इतने बड़े नामों से सीधे टकराना सबके बस की बात नहीं है। लेकिन स्टिंग की तारीफ तो दूर मीडिया तो इसकी बात तक नहीं कर रहा..जिन मीडिया संस्थानों का इसमें नाम है उनका इसे ना दिखाना समझ में आता है लेकिन जिनके नाम नहीं हैं उनका इससे बचना हैरान करता है…इनके बचने की एक वजह शायद कोबरापोस्ट का दूसरा हिस्सा हो, जिसका अभी सामने आना बाकी है।
कोबरा पोस्ट के स्टिंग की चर्चा से नेताओं का बचना समझ आता है, मीडिया संस्थानों का भी बचना समझ आता है..लेकिन उन संस्थानों में काम कर रहे हजारों लोगों का इस पर खामोशी ओढ़ लेना समझ से परे है। कुछ लोग तो इसपर बोल ही नहीं रहे तो वहीं कुछ लोग उनके ही समर्थन में बोलने लगे हैं जिनका स्टिंग हुआ है। इन लोगों का कहना है कि हमने इनका नमक खाया है या खा रहे हैं तो कैसे बोलें? लेकिन ये लोग भूल रहे हैं कि इस नमक से ज्यादा कीमत उस भरोसे की है जो लोग पत्रकारिता या मीडिया पर करते हैं। हांलाकि इसमें थोड़ी गिरावट जरूर हुई है।

मेरे एक सीनियर हमेशा कहा करते थे कि ‘हमेशा अपने काम से प्यार करो संस्थान से नहीं’ लेकिन जहां हम लगातार काम करते हैं उस जगह से एक लगाव तो हो ही जाता है मुझे भी हो गया था लेकिन अब जब उसी चैनल को पैसे के लिए कुछ भी करने को, कुछ भी चलाने को बोलते हुए सुना तो शर्मिंदगी महसूस हुई। लेकिन एक सच ये भी है कि यहां मैंने बहुत कुछ सीखा है यहां से शुरुआत की है तो खास तो रहेगा ही लेकिन जो गलत है वो गलत है।
सबसे बड़ा सवाल मन में ये उठता है कि किसी घटना या भ्रष्टाचार की खबर तो मीडिया दिखा देगी लेकिन जब मीडिया में ही भ्रष्टाचार हो तो उनकी खबर कौन दिखाएगा? प्रेस फ्रीडम रैंकिंग (2017) में भारत का 180 देशों की सूची में 136वां स्थान है। इससे बुरा क्या हो सकता है?
दरअसल, हम ऐसे दौर में रह रहे हैं जहां लोगों में मीडिया का भरोसा दिन-ब-दिन कम होता जा रहा है। इसलिए हम सभी को हमेशा अपने अंदर की पत्रकारिता को बचाने की कोशिश करती रहनी पड़ेगी। क्योंकि खतरा बड़ा है। महशर बदायुनी का एक शेर याद आता है, “अब हवाएं ही करेंगी रौशनी का फैसला जिस दिए में जान होगी वो दिया रह जाएगा”।
मीडिया में ही कई लोगों को अक्सर कहते सुना है कि अब पत्रकारिता नहीं बची और ना कोई पत्रकार है। तब मुझे लगता है शायद उन्हें खुद पर ही भरोसा नहीं है। क्योंकि अगर होता तो कम से कम उनकी एक पत्रकार से तो जान-पहचान होती, जो कि वो खुद होते। कोबरापोस्ट के स्टिंग के बाद की चुप्पी सभी के लिए खतरनाक है राजनीति के लिए लोकतंत्र के लिए और पत्रकारिता के लिए तो है ही ।
तू जब राह से भटकेगा, मैं बोलूंगा
मुझको कुछ भी खटकेगा, मैं बोलूंगा
सच का लहजा थोड़ा टेढ़ा होता है,
तू कहने में अटकेगा, मैं बोलूंगा

Friday, 30 March 2018

दंगों के बीच अफवाहों के इस दौर में काश मौलाना राशिद की कही बात भी वायरल हो जाए



गुस्से में उबलकर बदला लेना आसान है लेकिन अपने दुख को दबाकर बदलाव की अपील करना हिम्मत का काम है। 
जरा सोचिए एक आदमी दंगे में अपना बेटा खो देता है और उसके सामने उसके बेटे की लाश पड़ी है तो उस समय उसके दिमाग में क्या चल रहा होगा..? जबरदस्त गुस्सा, बदले की भावना। लेकिन फिर भी वो आदमी शांति की बात करता है बदला ना लेने की बात करता है तो इसका मतलब इंसानियत अभी जिंदा है।   


बंगाल में रामनवमी पर दंगे हुए जो अभी भी चल रहे हैं। इन दंगों में चार लोगों की जान जा चुकी है।सैकड़ों लोग बेघर हो चुके हैं दुकाने घर जला दिए हैं। लेकिन नेता अब भी दंगों को भड़काने का काम कर रहे हैं।


दंगों की भेंट चढ़े चारों में से एक था सिबतुला राशिदी...मौलाना इमदादुल राशिदी का बेटा। मौलाना राशिदी आसनसोल की एक मस्जिद में इमाम हैं। और उनका बेटा सिबतुला 16 बरस का था। 27 मार्च की दोपहर से लापता था। बुधवार देर रात उसकी लाश मिली। ये देखकर इलाके मुसलमानों में जबदस्त गुस्सा था। और जब सिबतुला के घर वाले उसकी लाश को दफनाने ईदगाह मैदान पहुंचे तो वहां हजारों की भीड़ जुट गई। कुछ लोगों बदला लेने की बात शुरू कर दी। मौलाना राशिद को लगा मुसलमान बौखलाकर जवाबी हिंसा कर सकते हैं। 
वो भीड़ के सामने आए और उसके बाद जो कहा उसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। उन्होंने कहा कि अगर मेरे बेटे की मौत का बदला लेने की कोशिश की, तो मैं मस्जिद छोड़ दूंगा और ये शहर भी छोड़ दूंगा।
मौलाना राशिद का कहना है कि मैं अमन चाहता हूं मेरा बेटा तो मुझसे छीन लिया गया है। मैं नहीं चाहता कि कोई और परिवार अपने अपनों को खोए। मैं नहीं चाहता कि कोई और घर जले। मैं भीड़ से कह चुका हूं। अगर मेरे बेटे का बदला लेने के लिए कुछ किया जाता है, तो मैं आसनसोल छोड़कर चला जाऊंगा। अगर आप लोग मुझसे प्यार करते हैं, तो आप किसी पर अपनी एक उंगली भी नहीं उठाएंगे।
वहां मौजूद लोगों का कहना है कि जब राशिदी भीड़ के आगे खड़े होकर बोल रहे थे, तो वहां मौजूद कई लोग रोने लगे। उस समय माहौल बहुत गमगीन था। सुनने वाले ताज्जुब में थे। कि निर्दोष बेटे को खोने वाला बाप बदला नहीं चाहता, शांति चाहता है।
मौलाना राशिद की कही बात हिंदूओं और मुसलमानों को बार-बार सुननी चाहिए

रामनवमी के दिन बिहार, पश्चिम बंगाल और गुजरात में भड़की सांप्रदायिक हिंसा की लपटें दूसरे राज्यों में फैलती जा रही हैं। अब राजस्थान में भी तनाव का माहौल बन चुका है। तनावपूर्ण माहौल को देखते हुए राज्य के बूंदी में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई हैं।

पता नहीं लोग ये बात समझेंगे कि दंगों में सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी का होता है तो वो आम जनता है का और सबसे ज्यादा फायदा नेताओं को होता है। 



लेकिन मौलाना राशिद ने इस बात को साबित कर दिया कि दंगों में सभी जानवर नहीं हुए हैं कुछ इंसान भी हैं। और उनसे ही उम्मीद भी है कि सब ठीक हो जाएगा। 

Friday, 23 March 2018

दिल्ली हाईकोर्ट ने ना केवल आप विधायकों की सदस्यता बचाई है, लोकतंत्र को भी बचाया है !



दिल्ली हाईकोर्ट (HC) ने ये साबित कर दिया कि जब कभी लोकतंत्र की कोई संस्था उसे कमजोर करने की कोशिश करती है तब उसी लोकतंत्र की दूसरी संस्था उसे बचाने और मजबूत करने का काम करती है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने आम आदमी पार्टी (AAP) के 20 विधायकों को बड़ी राहत देते हुए उनकी सदस्यता बहाल कर दी है। इसके साथ ही राष्ट्रपति के फैसले को रद्द कर दिया और कोर्ट ने चुनाव आयोग को मामले में फिर से सुनवाई करने को कहा है। कोर्ट के फैसले के बाद सभी 20 विधायक बने रहेंगे।
मुख्य चुनाव आयुक्त (ECI) अचल कुमार ज्योति ने अपने कार्यकाल के आखिरी समय में जिस तरह से जाते-जाते जल्दी में फैसला दिया और राष्ट्रपति महोदय ने जिस तरह से उस पर मोहर लगाई वो हैरान करने वाला था। दिल्ली के 20 विधानसभा को बिना विधायक के कर देना क्या छोटी बात है? कई राज्यों में लाभ के पद के मामले चल रहे हैं लेकिन फैसला सिर्फ एक सरकार के खिलाफ ही आता है।
साल 2006 में शीला दीक्षित ने 19 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया। लाभ के पद का मामला आया तो कानून बनाकर 14 पदों को लाभ के पद की सूची से बाहर कर दिया। केजरीवाल ने भी यही किया। शीला के विधेयक को राष्ट्रपति को मंजूरी मिल गई, केजरीवाल के विधेयक को मंजूरी नहीं दी गई।
मार्च 2015 में दिल्ली में 21 विधायक संसदीय सचिव नियुक्त किए जाते हैं। जून 2015 में छत्तीसगढ़ में भी 11 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया जाता है। इनकी भी नियुक्ति HC से अवैध ठहराई जा चुकी है।
इस पर मीडिया रिपोर्टिंग भी हैरान कर देने वाली है। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसला सुनाने से कुछ देर पहले आज तक पर एक पूरा पैनल बहस कर रहा था। चैनल ये मान कर चल रहा था कि फैसला आम आदमी पार्टी (AAP) के खिलाफ ही आएगा। चैनल ने ब्रेकिंग भी चलानी शुरू कर दी और बहस में हिस्सा ले रहे वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने अरविंद केजरीवाल की आलोचना भी शुरू कर दी। अंजना ओम कश्यप भी बुलंद आवाज के साथ ब्रेकिंग न्यूज पढ़ रही थीं।
तभी इसके विपरित खबर आती है और जब शो की एकंर अंजना ओम कश्यप ने बताया कि फैसला तो आम आदमी पार्टी के पक्ष में आया है तब सभी के सुर अचानक बदल गए।
कई लोग कह रहे हैं कि केजरीवाल आदर्श की राजनीति कर रहे हैं, इसलिए उन्हें 21 विधायकों को संसदीय सचिव नहीं बनाना चाहिए था, अगर आदर्श की राजनीति का पैमाना यही है तो बाकि मुख्यमंत्री क्या कर रहे हैं? क्या उनसे ऐसी राजनीति की उम्मीद नहीं है? दरअसल इस तरह के मामले राष्ट्रपति पद की गरिमा और चुनाव आयोग की साख को कम करने का ही काम करेंगे।

भगत सिंह: सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज





भारत वर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है. एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं. अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है. यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें. किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिंदुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है.
यह मार-काट इसलिए नहीं की गई कि फलां आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फलां आदमी हिंदू है या सिख है या मुसलमान है. बस किसी व्यक्ति का सिख या हिंदू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था. जब स्थिति ऐसी हो तो हिंदुस्तान का ईश्वर ही मालिक है.

ऐसी स्थिति में हिंदुस्तान का भविष्य बहुत अंधकारमय नजर आता है. इन धर्मोंने हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है. और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे. इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है. और हमने देखा है कि इस अंधविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं.

कोई विरला ही हिंदू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठंडा रखता है, बाकी सब के सब अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डंडे लाठियां, तलवारें-छुरे हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सिर फोड़-फोड़कर मर जाते हैं. बाकी कुछ तो फांसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिए जाते हैं. इतना रक्तपात होने पर इन धर्मजनोंपर अंग्रेजी सरकार का डंडा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है.

यहां तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे सांप्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है. इस समय हिंदुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली. वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो समान राष्ट्रीयताऔर स्वराज-स्वराजके दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाए चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मांधता के बहाव में बह चले हैं.

सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो सांप्रदायिक आंदोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं. जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं. और सांप्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आई हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे. ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है.

दूसरे सज्जन जो सांप्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं. पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊंचा समझा जाता था. आज बहुत ही गंदा हो गया है. यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौवल करवाते हैं. एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं. ऐसे लेखक बहुत कम हैं, जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शांत हो.

अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों के भीतर से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं मिटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है. यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि भारत का बनेगा क्या?’
सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है. दरअसल, भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है. भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धांत ताक पर रख देता है.

सच है, मरता क्या न करता. लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होना अत्यंत कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती. इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिए और जब तक सरकार बदल न जाए, चैन की सांस नहीं लेना चाहिए.

लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है. गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं. इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए. संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं. तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथों में लेने का प्रयत्न करो. इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जाएंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी.

जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि जार के समय वहां भी ऐसी ही स्थितियां थीं, वहां भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूतम-पैजार करते रहते थे. लेकिन जिस दिन से वहां श्रमिक-शासन हुआ, वहां का नक्शा ही बदल गया था. अब, वहां कभी दंगे नहीं हुए. अब वहां सभी को इंसानसमझा जाता है, ‘धर्मजननहीं. जार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब थी. इसलिए सब दंगे-फसाद होते थे. लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गई है और उनमें वर्ग-चेतना आ गई है इसलिए अब वहां से कभी किसी दंगे की खबर नहीं आती.

इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन कलकत्ते के दंगों में एक बात बहुत खुशी की सुनने में आई. वह यह कि वहां दंगों में ट्रेड यूनियन के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन सभी हिंदू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे. यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे. वर्गीय-चेतना का यही सुंदर रास्ता है, जो सांप्रदायिक दंगे रोक सकता है.

यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से, जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं. उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नजर से- हिंदू, मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन सभी को पहले इंसान समझते हैं, फिर भारतवासी. भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहरा है. भारतवासियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए. उन्हें यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, और दंगे हों ही नहीं.

1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था. वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं. न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सबको मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता. इसलिए गदर पार्टी जैसे आंदोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फांसियों पर चढ़े और हिंदू-मुसलमान भी पीछे नहीं रहे.

इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं. झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुंदर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं. यदि धर्म को अलग कर दिया जाए तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं. धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें.
हमारा ख्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताए इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमें बचा लेंगे।

शहीदे आजम भगत सिंह का यह आलेख जून, 1928 में किरती नामक पत्र में छपा था, जिसके लिए भगत सिंह उस वक्त लिखते थे।

Thursday, 22 March 2018

कविता: च से 'चिड़िया'





अकसर आंगन में दिख जाती थी गौरेया
बच्चे उड़ा कर हो जाते थे खुश
जब नहीं दिखती थी तब आटे की लोई से 
बना कर दी जाती थी 'चींचीं'
और बच्चे फिर हो जाते थे खुश
वक़्त की मार और बदलाव की बयार ने
दोनों को उड़ा दिया
बच्चे अब नहीं होते खुश
देखते हैं बस तस्वीरों में फोन की स्क्रीन पर
अब बस याद कर लेते हैं.. च से 'चिड़िया'