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Wednesday, 14 March 2018

किसानों की इस सादगी भरे विरोध प्रदर्शन को क्यों ना सराहा जाए?



किसानों की इस सादगी भरे विरोध प्रदर्शन को क्यों ना सराहा जाए और क्यों ना उन लोगों को एक सबक के तौर पर देखा जाए जो अपनी मांगें मनवाने के लिए भी कई बार देश में अराजकता का माहौल पैदा करते आए हैं। जाट आरक्षण का आंदोलन और पद्मावत फिल्म विवाद इसी का उदाहरण हैं।

7 मार्च को करीब 35000 किसान नासिक से मुंबई तक का सफर पैदल तय करने निकलते हैं। एक साथ लाइन में जैसे कोई सेना की टुकड़ी निकलती है। बिना हुड़दंग काटे, बिना शोर मचाए। कोई नंगे पैर था तो किसी के एक पैर में चप्पल थी, खून से लथपथ पैर एक साथ आगे बढ़ रहे थे। ये सभी अपने घर वालों को पीछे छोड़कर इस उम्मीद में निकले थे कि बेखबर दुनिया के लोग उनकी बात सुनेंगे।


लेकिन किसी ने इन पर ध्यान नहीं दिया। मीडिया ने भी नहीं। तब चैनल वही कर रहे थे जो अकसर करते आए हैं और वो था किसी जरूरी खबर को दबाने के लिए गैरजरूरी मुद्दों को सामने लाने का काम। इन दिनों कोई किसी नेता को मेकअप पोत कर एंकरिंग करवा रहा था। तो कोई क्रिकेटर शमी की पारिवारिक समस्या को सुलझाने का काम कर रहा था।

लेकिन कहते हैं न कि चुप्पी बहुत शोर करती है, किसानों की चुप्पी ने भी वही किया। जब इनके पैरों के छाले फूटे, खून निकला, लोगों की सहानुभूति बढ़ी तो मीडिया भी जागा। हालांकि उसमें भी किसानों के किसान होने पर शक की खबरें ज्यादा थीं। जैसे कि ये सब किसान नहीं हैं, 35 हजार नहीं इतने किसान आये हैं..वगैरह वगैरह।
सोशल मीडिया पर कुछ BJP समर्थित फेसबुक ग्रुप में कुछ तस्वीरों के जरिए किसानों के आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की गई। सवाल उठाए गए कि ये खेती छोड़कर यहां क्या कर रहे हैं और इन्हें झंडे और टोपी खरीदने के लिए पैसे किसने दिये? BJP की नेता और सांसद पूनम महाजन ने तो इन किसानों के लिए ये कह दिया कि महाराष्ट्र में प्रदर्शन कर रहे लोग किसान नहीं शहरी माओवादी हैं।


इस तरह के मैसेज बनाने और दूसरों को भेजने वालों थोड़ी तो शर्म करो। किसी की जिंदगी और मौत का मजाक मत बनाओ…क्या कोई एक कैप और एक झंडे के लिए इस गर्मी में 180 किमी पैदल चल सकता है..क्या तुम चल सकते हो?

किसानों ने अपने प्रदर्शन के दौरान मुंबई के लोगों के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए सुबह सड़कों पर जाम न लग जाये इसलिए रात को ही इस यात्रा को आगे बढ़ाया। इसके अलावा हाईस्कूल के छात्रों की सोमवार को परीक्षा होने के कारण भी किसानों ने रात को मार्च निकाला, जिससे छात्र जाम में फंसकर परीक्षा केंद्रों पर देर से ना पहुंचे।
किसानों के इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन का मुंबईवासियों ने भी दिल खोलकर स्वागत किया। किसानों की इस पैदल यात्रा को हर तबके के लोगों का समर्थन मिला। मुंबई पहुंचते ही इन किसानों के लिए हर धर्म के लोग आगे बढ़कर आए और हाथ से हाथ मिलाकर न सिर्फ किसानों की मांगों का समर्थन किया, बल्कि पानी, भोजन समेत कई तरह की व्यवस्थाएं किसानों के लिए कीं।

लेकिन ये किसानों का दुर्भाग्य है कि उन्हें अपने अधिकारों के लिये बार-बार आंदोलन करना पड़ता है। इस बार भी किसानों ने कहा है कि अगर हमारे साथ धोखा होता है तो हम फिर लौटेंगे।
उम्मीद की जानी चाहिए कि अब अन्नदाताओं के साथ धोखा नहीं होगा, लेकिन जिस तरह से इन किसानों ने 180 किमी की पैदल यात्रा की और मांगें मानने के बाद चुपचाप वापस चले गए उससे देश के लोगों का दिल तो जीत ही लिया और विरोध करने का सही तरीका भी बता दिया।

Monday, 12 March 2018

सवालों का सामना करते राहुल गांधी और मीडिया का सौतेला व्यवहार



सिंगापुर दौरे पर गए राहुल गांधी एक इंटरव्यू में जब फंसते दिखाई दिए तो मीडिया ने वो तुरंत लपक लिया और चलाया कि राहुल गांधी की बोलती बंद। लेकिन सिंगापुर में ही राहुल गांधी ने बचे हुए सवालों का जवाब देने के लिए अपनी फ्लाइट छोड़ दी और इस खबर का जिक्र तक ना होना थोड़ा अखरता है। जब एंकर ने कहा कि हमारे पास सवाल बहुत है सर, लेकिन आपके पास समय की कमी है आपकी फ्लाइट है। जिस पर राहुल गांधी ने कहा- तो क्या हुआ.. अगली फ्लाइट से चला जाऊंगा आप पूछिए सवाल।


 “किसी व्यक्ति की योग्यता इस बात से मापी जा सकती कि उसने कितने सवालों के सही जवाब दिए लेकिन उसकी हिम्मत का पता इस बात से जरूर लगाया जा सकता है कि उसने कितने सवालों का सामना किया। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसके पास सारे सवालों के जबाव हों लेकिन ऐसे कम लोग हैं जो सभी सवालों का सामना करते हैं।”
हमारे PM नरेंद्र मोदी भी 2014 से पहले सवालों का सामना करने वालों में से एक थे लेकिन तब से अब तक 4 साल हो गए एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। एक-दो चैनलों को ही इंटरव्यू दिए और उन इंटरव्यू में पूछे गए सवालों का स्तर किसी से छिपा नहीं है। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी देश में कम इंटरव्यू देते हैं लेकिन विदेश में तीखे सवालों का सामना करते दिखाई दे रहे हैं।
राहुल गांधी भले ही कम बोल पाते हों मोदी की तरह परिपक्व नेता नहीं हैं लेकिन मीडिया से तो यही उम्मीद की जाती है कि जो जैसा है वैसा तो दिखाया जाए। आप अगर  पक्ष लेते दिखाई देंगे तो जिसका आप पक्ष ले रहे हैं उसे तो फायदा होगा लेकिन आपकी छवि और लोगों में आपकी विश्वसनियता में जरूर कमी आएगी।

Wednesday, 7 March 2018

BJP के भगत सिंह और भगत सिंह के लेनिन


‘रुको अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से बात कर रहा है’
ये बात भगतसिंह ने कही थी..इसमे पहले क्रांतिकारी खुद भगत सिंह थे और दूसरे थे (Vladimir Lenin) व्लादमिर लेनिन…और ये बात उस समय कही गई थी जब जेलर भगत सिंह को फांसी के लिए बुलाने पहुंचा था।

भगत सिंह लेनिन से किस कदर प्रभावित थे इसका अंदाजा एक और घटना से लगाया जा सकता है। फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे थे। भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में में चक्कर लगा रहे थे। उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब ‘रिवॉल्युशनरी लेनिन’ लाए या नहीं? जब मेहता ने उन्हें किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज्यादा समय न बचा हो। कितना गहरा रहा होगा लेनिन से भगत सिंह का विचारों का रिश्ता, कि अपने आखिरी समय में भी लेनिन को पढ़ना चाहते थे।

जिन व्लादमिर लेनिन से भगत सिंह इतने प्रभावित थे और भगत सिंह से पीएम मोदी खुद को प्रभावित बताते हैं अब वही लेनिन BJP समर्थकों को अखरने लगे हैं। दरअसल त्रिपुरा में BJP ने सभी को चौंकाते हुए विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत दर्ज की और वाम दलों का बरसों पुराना किला ढहा दिया। राजधानी अगरतला से लेकर दिल्ली तक, इस जीत की धमक सुनाई दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे विचारधारा की जीत बताया।
लेकिन जीत का ये उत्साह और खबरें अभी ठंडी भी नहीं हुई थीं कि त्रिपुरा से आए वीडियो और तस्वीरों ने सभी का ध्यान खींच लिया। इस वीडियो में BJP की टोपी पहने कार्यकर्ताओं के बीच एक JCB मशीन लेनिन की एक प्रतिमा को तोड़ने की कोशिश कर रही है।

जिसके बाद मूर्ति तोड़ने का सिलसिला शुरू हुआ और तमिलनाडु में बड़े समाज सुधारक रहे पेरियार की मूर्ति भी तोड़ दी गई वहीं पश्चिम बंगाल के कालीघाट में भारतीय जन संघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति को नुकसान पहुंचाने की बात सामने आई है।
दुनिया में कई जगह सत्ता परिवर्तन के साथ मूर्तियां तोड़ी गई हैं। सत्ता परिवर्तन के साथ ही मूर्तियां न तोड़ी जाएं, इसका अच्छा उदाहरण भारत ही है। देश में दिल्ली और लखनऊ समेत कई जगहों पर आपको रानी विक्टोरिया से लेकर कई वायसराय और तमाम बड़े अंग्रेज अफसरों की मूर्तियां खड़ी दिखाई देंगी। आजादी के बाद ब्रिटिश साम्राज्य की इन निशानियों को तोड़ा नहीं गया, बल्कि शहर के सुरक्षित इलाके में पहुंचा दिया गया। वहीं पाकिस्तान में जिस तरह से सर गंगाराम की मूर्ति को तोड़ा गया, उस पर प्रसिद्ध कहानीकार मंटो ने बाकायदा एक कहानी लिखी थी।

जो लोग मूर्ति तोड़ने का समर्थन कर रहे हैं वे शायद ये भूल रहे हैं कि किसी के विचार मूर्ति तोड़ने या उस व्यक्ति को मारने से खत्म नहीं होते यही भूल अंग्रेजों ने की थी भगत सिंह को फांसी देकर और यही भूल की नाथूराम गोडसे जैसे लोगों ने जिन्होंने महात्मा गांधी को मार दिया। ये सोचकर की इनके विचार थम जाएंगे लेकिन किसी को मारने से किसी के विचार भला रुकते हैं कहीं? मूर्ति तोड़ने वालों को नहीं भूलना चाहिए कि कई देशों में महात्मा गांधी की भी मूर्ति लगी है जिसे कोई और नुकसान पहुंचा सकता है।
 दरअसल यही है भारत होने का मतलब जहां सत्ता बदलने के बाद इतिहास को तोड़ा नहीं जाता बल्कि उसे सहेज कर रखा जाता है अगली पीढ़ियों के लिए। लेकिन शायद ये बात कुछ लोगों के समझ में नहीं आएगी।

Monday, 19 February 2018

पीएनबी के बाद रोटोमैक घोटाला देश के ‘चौकीदार’ से क्यों हो रही है चूक!

'आंखें खोलिए मिस्टर पीएम' 


देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक में 11000 हजार करोड़ से बड़ा घोटाला सामने आया है, कहा जा रहा है कि ये अब तक के इतिहास का सबसे बड़ा बैंकिग घोटाला है। पंजाब नेशनल बैंक की मुंबई स्थित एक शाखा में 11,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा के घोटाले का मामला सामने आया है। और बैंक ने इस घोटाले की पुष्टि भी की है। इस संबंध में बैंक ने अपने 10 कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है और 13 फरवरी को मामले की शिकायत सीबीआई से की है।
दिलचस्प बात ये है कि इस पूरे घोटाले का खुलासा खुद पंजाब नेशनल बैंक ने ही किया। बैंक की तरफ से कहा गया कि उसने 1.77 अरब डॉलर (करीब 11,400 करोड़ रुपये) के घोटाले को पकड़ा है। इस मामले में अरबपति हीरा कारोबारी नीरव मोदी ने कथित रूप से बैंक की मुंबई शाखा से फ़र्ज़ी गारंटी पत्र (एलओयू) हासिल कर अन्य भारतीय ऋणदाताओं से विदेशी ऋण हासिल किया।


इस घोटाले की चर्चा अभी थमी ही नहीं थी, कि अब रोटोमैक कंपनी के मालिक का नया घोटाला सामने आया है,  रोटोमैक ब्रांड नाम से कलम बनाने वाली कंपनी के प्रवर्तक विक्रम कोठारी ने कथित रूप से सात बैंकों के साथ 3,695 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की। इसको देखते हुए केंद्रीय जांच एजेंसियों ने उसके खिलाफ मामले दर्ज किये और कानपुर में उसके परिसरों की तलाशी ली।
एक अजीब और हास्यासपद सी कोशिश की जा रही है। दरअसल इतने बड़े घोटाले को सरकार अकेले संभाल नहीं पा रही शायद इसीलिए इसकी जिम्मेदारी पुरानी सरकार और आरबीआई के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन पर डालने की तैयारी की जा रही है। और कहा जा रहा है कि घोटाले की शुरूआत 2011 में हुई थी और तब देश में यूपीए की सरकार थी और उस समय आरबीआई गर्वनर रघुराम राजन थे, लेकिन एक कागज के टुकड़े ने इस दावे की हवा निकाल दी जिसमें साफ-साफ दर्ज है कि 2011 से 2017 के बीच करीब 150 एलओयू यानि लेटर ऑफ अंडरटेकिंग जारी हुई है। और सबसे ज्यादा 2017-18 में जारी की गई है।



एलओयू वह पत्र है होता है जिसके आधार पर एक बैंक के जरिए अन्य बैंकों को एक तरह से गारंटी पत्र उपलब्ध कराया जाता है जिसके आधार पर विदेशी शाखाएं ऋण की पेशकश करती हैं।
अब इतना बड़ा घोटाला हुआ है तो विपक्ष भी सरकार पर हमलावर है। कांग्रेस के नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर सवाल उठाए है। कांग्रेस नेता ने केंद्र पर हमला बोलते हुए कहा कि ‘लूटो और भाग जाओ’ मोदी सरकार का चाल, चरित्र और चेहरा बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जुलाई, 2016 में ही वित्‍तीय फर्जीवाड़े की जानकारी दी गई थी, इसके बावजूद क्‍या मोदी सरकार सोई हुई थी?
वहीं दूसरी तरफ बीजेपी ने भी कांग्रेस पर पलटवार किया। रविशंकर प्रसाद ने कहा कि इस मामले की जांच हो रही है और इसमें किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने कांग्रेस की सरकार में हुए भ्रष्टाचार की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि‘जिनके घर ऐसे शीशे के हों जो टुकड़े-टुकड़े हो चुके हैं वो दूसरों पर पत्थर फेंकना बंद करें’।
दरअसल होता यही है कोई भी बड़ा घोटाला होता है तो जिसकी सरकार में होता है वो विपक्ष के घोटाले की याद दिलवाता है और विपक्ष सरकार के घोटाले की याद। और इस बहाने दोनों के गुनाह छिपाने का काम किया जाता है। लेकिन सरकार को जबाव तो देना ही होगा क्योंकि जिन नीरव मोदी पर घोटाले का आरोप हैं वो दावोस में पीएम मोदी के साथ तस्वीरों में नजर आ रहे हैं। आपने जनता से 60 दिन की चौकीदारी मांगी थी और जनता ने भी दिल खोलकर आपको वोट के साथ-साथ अपना भरोसा दिया, लेकिन फिर भी इस तरह के घोटाले होंगे तो आपकी चौकीदारी पर सवाल तो उठेंगे ही।

Monday, 12 February 2018

भारतीय सेना बनाम आरएसएस की ‘फौज’




भारतीय सेनाजिसका नाम सुनते ही हर भारतीय गर्व का अनुभव करता है उसे सम्मान की नजरों से देखता है और सेना पर गर्व करने की वजह भी है क्योंकि भारतीय सेना ने कई दफा बेहद मुश्किल हालातों में असाधारण शौर्य का परिचय दिया है। सेना पर गर्व करने की एक वजह ये भी ये भी है कि सेना खुद को अभी तक राजनीति से दूर रखने में कामयाब हो पायी है शायद इसीलिए आम जन को सेना पर विश्वास बाकि संस्थाओं से ज्यादा है, लेकिन हाल-फिलहाल की घटनाओं से लगता है कि भविष्य में राजनीति सेना को भी अपनी चपेट में ले लेगी फिर चाहे वो सर्जिकल स्ट्राइक के बाद बीजेपी का उसे चुनाव में भुनाना हो या विपक्ष का सर्जिकल स्ट्राइक पर संदेह जताना हो तब बीजेपी ने खूब हल्ला मचाया था कि विपक्ष सेना का मनोबल गिराने का काम कर रहा है। इसके बाद विपक्षी दल बैकफुट पर आ गए और कहा गया कि उन्हें सेना पर शक नहीं है बल्कि वे तो इसका राजनैतिक इस्तेमाल ना करने की बात कह रहे हैं। खैर जो भी हुआ हो लेकिन इस तरह की घटनाओं ने उसके मनोबल को ठेस तो पहुंचाई ही होगी।

लगता है अब फिर से वही काम किया जा रहा है और अब ये किया जा रहा है आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के द्वारा जो अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के चक्कर में खुद इतने उत्साह में आ गए कि सेना की कार्यक्षमता पर ही सवाल खड़े कर दिए। दरअसल मोहन भागवत पिछले 5 दिनों से मुजफ्फरपुर में डटे हुए थे जहां वे अपने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाने का काम कर रहे थे जहां उन्होंने कहा कि सेना के लोग युद्ध की स्थिति में तैयार होने में छह से सात महीने का वक्त लगा सकते हैं लेकिन हमारे लोग यानी संघ के कार्यकर्ता दो से तीन दिन में ही तैयार हो जाएंगे। बिहार के मुजफ्फरपुर में आयोजित आरएसएस के पांच दिवसीय कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि संघ के लोग सेना की तरह ही अनुशासित होते हैं। उन्होंने कहा कि अगर संविधान और कानून इजाजत दे तो युद्ध की स्थिति में हमारे स्वयंसेवक सेना से भी पहले तैयार होकर मौके पर पहुंचने में सक्षम होंगे। मोहन भागवत ने ये भी कहा कि उनका संगठन पारिवारिक है लेकिन उसमें अनुशासन बहुत है। समझ नहीं आता कि मोहन भागवत अपनी इन बातों से कहना क्या चाहते हैं, मोहन भागवत अपना संगठन पारिवारिक बता रहे हैं संगठन में घोर अनुशासन होने की बात कर रहे हैं तो सेना कहां बाहर की है क्या वह पारिवारिक नहीं या उसमें अनुशासन नहीं है दरअसल सेना में हर वो चीज है जो एक देश के लिए जरूरी है बस नहीं है तो राजनीति। लेकिन राजनैतिक दल सेना को जबरन राजनीति में घसीटने का काम कर रहे हैं। आरएसएस और मोहन भागवत को ये हमेशा याद रखना चाहिए कि सेना हमेशा तिरंगे के साए में खड़ी होती है और हमेशा उसी के लिए लड़ती है लेकिन आप भगवा झंडे के नीचे खड़े होते हैं और यही सबसे बड़ा फर्क आपकी सेना में और भारतीय सेना में।

अगर थोड़ा इतिहास में झांका जाए तो ये वही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है जो आजादी से पहले और आजादी के बाद से लेकर 2002 तक तिरंगे की जगह भगवा झंडा फहराते आये हैं। साल 2002 में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के नागपुर कार्यालय में पहली दफा उस समय के एनडीए के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तिरंगा झंडा फहराने की शुरूआत की थी।

एक और वाक्या याद कीजिए जब अगस्त 2013 को नागपुर की एक निचली अदालत ने वर्ष 2001 के एक मामले में दोषी तीन आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया था। इन तीनों आरोपियों बाबा मेंढे, रमेश कलम्बे और दिलीप चटवानी का जुर्म तथाकथित रूप से सिर्फ इतना था कि वे 26 जनवरी 2001 को नागपुर के रेशमीबाग स्थित आरएसएस मुख्यालय में घुसकर गणतंत्र दिवस पर तिरंगा झंडा फहराने के प्रयास में शामिल थे।
 राष्ट्रप्रेमी युवा दल के यह तीनों सदस्य दरअसल इस बात से नाराज थे कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे अवसरों पर भी आरएसएस के दफ्तरों में कभी तिरंगा नहीं फहराया जाता।

सवाल यह है कि जिस भवन पर यह युवक तिरंगा फहराना चाहते थे वो कोई मदरसा नहीं था. वो तो आरएसएस का राष्ट्रीय मुख्यालय था जिसकी देशभक्ति पर आज कोई भी सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता. तब फिर क्या वजह थी कि संघ इस कोशिश पर इतना तिलमिला गया कि तीनों युवकों पर मुकदमा दर्ज हो गया और 12 साल तक वो लड़के संघ के निशाने पर बने रहे।


मोहन भागवत के इस बयान का विरोध होना शुरू हो चुका है और होना भी चाहिए क्योंकि इस तरह के बयान सेना के मनोबल को कम करने का ही काम करेंगे जो कि ना तो सेना के लिए अच्छा है ना देश के लिए और ना खुद राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के लिए भी।

Sunday, 14 January 2018

‘मुक्काबाज’ अनुराग कश्यप का सच्चा देशप्रेम ‘भारत माता की जय’

एक फिल्म आई है मुक्काबाज। बहुत दिनों बाद खेल को लेकर एक अच्छी और शानदार फिल्म आई है,ये फिल्म खेल के ऊपर बनी अब तक की फिल्मों से इसलिए भी अलग है क्योंकि हर फिल्म में आखिर में खेल और खिलाड़ी जीतते हुए ही नजर आते हैं। लेकिन इसमें ऐसा नहीं है। फिल्म में अनुराग कश्यप विनीत समेत सभी ने खूब महनत की है और उनकी ये महनत पूरी फिल्म पर दिखाई भी देती है।



लेकिन इन सबसे इतर फिल्म में और भी कई चीजें हैं जिनके लिए ये फिल्म लंबे समय तक याद की जाएगी। फिल्म में दिखाया गया कि कैसे एक खिलाड़ी जो सिर्फ खेलना चाहता है, लेकिन खेलों में हो रही राजनीति का शिकार होता है और उसका करियर बनते बनते रह जाता है, इसके साथ ही फिल्म गोरक्षा के नाम पर हो रही गुंडागर्दी और जातिवाद समेत कई मुद्दों को उठाती है, और  जातिवाद को लेकर फिल्म में एक अलग और दिलचस्प पहलू दिखाया गया है और वो ये है कि जातिवाद रिवर्स भी होता है जैसे एक रेलवे कर्मचारी यादव जी एक क्षत्रिय को सिर्फ इसलिए परेशान करते हैं कि उसके पुरखों ने उनके पिता जी को परेशान किया था, पूरी फिल्म पिछले सालों में घटी घटनाओं पर तगड़ा व्यंग है और फिल्म के गानों के बोल भी व्यंग करते जाते हैं, जैसे फिल्म में एक कविता है...
'खाकी रंग दीवारों पर लटकती गांधी की फोटो के पीछे से निकलती छिपकली
हाय कपटी हाय कमीनी जहर वाली छिपकली
जब कोई पतंगा पास से गुजरता है
धर दबोच लेती है पंख नोच लेती है, जिंदा निगल जाती है
फिर बड़े सलीके से जैसे कुछ हुआ ही ना हो, जैसे कोई मरा ही ना
रेंगती वापस फोटो के पीछे लौट जाती है छिपकली'
कहा जाता कि हर फिल्म में END में सब ठीक हो ही जाता है, लेकिन इस फिल्म में ऐसा नहीं होता क्योंकि ये फिल्म है ही नहीं ये ‘हकीकत’ है जिसे अनुराग कश्यप ने गड़ा है, और पूरी फिल्म का मर्म फिल्म खत्म होने के बाद दिखाई देता है जब पर्दे पर वो लिखा आता है जिसे आजकल हर समस्या का हल बताया जा रहा है
‘’भारत माता की जय’’

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Thursday, 7 December 2017

बधाई हो धर्म के ठेकेदारों आपका लगाया पेड़ ‘फल’ देने लगा है



पिछले कुछ सालों में हिंदू-मुस्लिम और लव जिहाद के नाम पर जो नफरत के बीज बोए जा रहे थे उस नफरत के पेड़ पर अब फल आने लगे हैं और पहला फल राजस्थान में मिला है, जहां एक आदमी ने लव जिहाद के नाम पर एक मुस्लिम को दिनदहाड़े काट दिया और उसे आग के हवाले कर दिया। इस पूरी घटना का उसने वीडियो भी बनाया..अजीब बात है कि लव जिहाद का जो शिकार बना है वो एक बुजुर्ग इंसान है जिसका नाम भट्टा शेख बताया जा रहा है। शायद उसे लव जिहाद का मतलब भी न पता हो। तभी जब उसपर धारदार हथियार से पहला हमला हुआ तो गिड़गिड़ाते हुए अपना कसूर पूछता है.. क्या हुआ सर? लेकिन बेरहम हमलावार लगातार हमला करता रहा और भट्टा शेख चीखता रहा।

दरअसल, ये हमला किसी इंसान ने नहीं....बल्कि एक विकृत मानसिकता ने किया है। क्योंकि अगर कोई इंसान हमला करता है तो उसे मारने के बाद चिंता या परेशानी होती है। लेकिन इस आदमी ने मारते समय न कोई दया दिखाई और न मारने के बाद इसे कोई पछतावा हुआ, बल्कि इसके उलट उसे ऐसा करने पर गर्व है।


मारने वाला शख्स शंभुनाथ इस हद तक नफरत का शिकार है कि एक निहत्थे बुजुर्ग को काटकर और थोड़ी सी जान बची होने पर जलाकर कैमरे पर साफ कहता है कि उसे नहीं पता कि उसने सही किया या गलत किया, पर उसे जो ठीक लगा, वो कर दिया। वीडियो में ये शख्स एेसे ही और भी अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने को कहता है।

वीडियो-



क्या आपको नहीं लगता कि ऐसी मानसिकता को पिछले कुछ समय में धर्म के कथित ठेकेदारों और कुछ नेताओं ने अपने वोट बैंक के लिए विकृत रुप दे दिया है। इस हत्या के लिए क्या अकेला यही आदमी दोषी हैनहीं बल्कि दो लोगों के सहज प्रेम को जिहाद ठहरा कर हिंदू युवकों को सरेआम हत्याओं को उकसाने वाले ज्यादा दोषी हैंअसल गुनहगार वे लोग हैंजिन्होंने यह ज़हर भरा है। अब कहां हैं साध्वी और साक्षी महाराज जैसे लोग जो लव जिहाद को हिंदू धर्म के लिए खतरा बताकर युवाओं को भड़काने का काम करते आ रहे हैं और कहां हैं वे स्टार पत्रकार जो लव-जिहाद को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बता रहे थे। ये घटना तो उस नफरत के पेड़ का पहला पका हुआ फल है..जो आज खुद गिरा है..लेकिन अगर इस पेड़ को जल्द ही ना काटा गया तो इस तरह के और भी फल देखने को मिलेंगे जो कहीं और अभी पकने की तैयारी में होंगे।

जिसके नाम पे करते हो
ये खून खराबा दिन रात ही तुम
वो भी तुमसे पूछेगा
किस ज़ाहिल की औलाद हो तुम
सोचो क्या आज़ाद हो तुम?
भीड़ का हिस्सा बनते हो
बिन जाने बिन समझे ही तुम
आवाम हो इस मुल्क की या
उमड़ता कोई फ़साद हो तुम
सोचो क्या आज़ाद हो तुम?