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Friday, 6 December 2019

सुनिए..मुख्यमंत्री जी उन्नाव की बेटी आपसे कुछ कहना चाहती है...


तालियों का शोर थोड़ा कम कीजिए...मैं एक सवाल पूछना चाहती हूं...उन न्यायाधीश से जिनसे मैंने बारबार कहा कि मेरी जान को खतरा फिर भी आपने उन आरोपियों को जमानत क्यों दी?
एक सवाल उस पुलिस से जो एनकाउंटर में माहिर है तो उसके होते हुए मेरा एनकाउंटर कैसे हो गया?
और एक आखिरी सवाल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से कि आपके होते हुए एक ही जगह पर दो-दो घटनाएं कैसे हो जाती हैं?और लड़की को बलात्कार के बाद FIR लिखवाने के आत्मदाह की धमकी क्यों देनी पड़ती है?अगर उस वक़्त आप अपने विधायक को बचाने की जगह उस लड़की के साथ खड़े होते तो मैं जिंदा होती...

वैसे तो ये सवाल मीडिया को पूछने चाहिए लेकिन वो सब तो ताली बजाने में व्यस्त हैं...उन्हें लगता है कल एनकाउंटर से सब सुधर चुका है...इसलिए मुझे पूछने पड़ रहे हैं...और आप ये सोचकर चुप मत रहना कि मैं तो रही नहीं तो जवाब कौन सुनेगा...अब आपसे जवाब हर ज़िंदा लड़की को चाहिए...अभी भले ही तालियों का शोर है लेकिन जैसे-जैसे ये शोर कम होगा आपसे सवाल पूछे जाएंगे.. इसलिए तैयारी कर लीजिए मुख्यमंत्री जी।

Wednesday, 17 July 2019

लड़की नहीं भाग रही हैं बल्कि समाज इतना धीमे चल रहा है कि उसे हर हक मांगती लड़ती भागती हुई दिख रही है...


साक्षी और अजितेश के मामले में लोगों की वो सोच सामने आ रही है जिसमें किसी की झूठी शान और इज्जत किसी की जान से ज्यादा बढ़कर मानी जा रही है।और दुख इस बात का है कि इस सोच में नई पीड़ी भी शामिल है।सभी को लड़की ही गलत लग रही है, सभी को वो लड़की परिवार के खिलाफ बागी लग रही है लेकिन ‘’बगावत हमेशा बंधन के खिलाफ होती है, डर के खिलाफ होती है, विश्वास के खिलाफ बगावत कभी नहीं होती’’ एक लड़की का घर से भाग जाना समाज के लिए कितनी बड़ी बात हो जाती है? एक परिवार के लिए कितनी शर्म की बात हो जाती है, लेकिन एक लड़की जब भागने का फैसला लेती है तो उसके पीछे डर होता है मौत का, उसे पता है कि अगर वो नहीं भागी तो उसके घरवालों का प्यार जाति से प्यार के सामने बौना हो जाएगा।अहमदाबाद का रहने वाले हरकेश सिंह ने उर्मिला के साथ जिंदगी बिताने और मौत से बचने के लिए 181 नंबर की हेल्पलाइन से मदद मांगी। काउंसलर ने उर्मिला के मां बाप को समझाया भी लेकिन जैसे ही उर्मिला के पिता दशरथ सिंह को पता चला कि बाहर गाड़ी में हरकेश भी है, वे अपने रिश्तेदारों के साथ बाहर आए और हरकेश सिंह को गाड़ी से उतारकर मार दिया। सोचिए पुलिस के सामने मार दिया।आज ऐसी न जाने कितनी ही खबरें आए दिन अखबारों में पढ़ने को मिलती रहती हैं, उन पर एक अजीब सी खामोशी छाई रहती है।वीडियो वायरल होने के बावजूद, पूरा मामला मीडिया में छाने के बावजूद साक्षी और अजितेश पर हमला हो जाता है और वो भी कोर्ट परिसर में सोचिए कितनी सुरक्षित है एक लड़की? दरअसल एक लड़की जो जिंदा है, बोल रही है लोगों को दिक्कत हो रही है। साक्षी मिश्रा उर्मिला की तरह नहीं थी।साक्षी ने अपने विधायक पिता राजेश मिश्रा पर भरोसा नहीं किया। दरअसल कुछ लोगों को दिक्कत ये है कि एक लड़की टीवी पर बैठकर जातिवादी समाज के खिलाफ बोल कैसे रही है उस पारिवारिक ढांचे पर चोट कैसे कर रही है?जिसमें घर की, समाज की सबकी इज्जत का ढेका एक लड़की ही उठाती है,पहले एक घर को घर बनाती है और फिर उसकी मर्जी पूछे बिना उसे किसी और घर पहुंचा दिया जाता है, वो उसे भी अपना घर बना लेती है, ये जानते हुए भी कि उसके घर के बाहर भी कभी उसके नाम की नेम प्लेट तक नहीं लगेगी।ऐसी लड़की जब खुलेआम बोलेगी तो इस समाज को दिक्कत तो होगी ही, ऐसी लड़की की तो तस्वीर टंगी होनी चाहिए थी फूल माला के साथ, और तब टीवी वाले भी उसके फोटो के साथ खबर चलाते ऑनर किलिंग की एक और शिकार, तब ना किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचती न हमारी संस्कृति का इतना नुकसान होता जैसा अब हुआ है।दरअसल लड़की नहीं भाग रही हैं बल्कि समाज इतना धीमे चल रहा है कि उसे हर हक मांगती लड़ती भागती हुई दिख रही है।

Sunday, 23 June 2019

कबीर सिंह सिर्फ पर्दे पर देखने के लिए है,रीयल लाइफ में कबीर सिंह ना होता है और ना होना चाहिए...

हाल ही में रिलीज हुई फिल्म #KabirSingh की तारीफ भी हो रही है और आलोचना भी...तारीफ होनी ही चाहिए क्योंकि इस फिल्म में शाहिद कपूर ने गजब की एक्टिंग की है...उनकी ऐनर्जी, उनका गुस्सा और वो सारी चीज़ें जो इस किरदार के लिए ज़रूरी थीं, उन सब चीज़ों पर शाहिद ने निश्चित तौर पर मेहनत की और वो स्क्रीन पर दिखती भी हैं...इसी तरह की एक्टिंग रितिक रोशन भी करते नजर आते हैं...कियारा खूबसूरत लगी हैं और क्लाईमेक्स में एक्टिंग भी दिखा जाती हैं।
वैसे ये समीक्षा लिखने की वजह फिल्म का अच्छा या बुरा होना नहीं है...वो तो आप फिल्म देखकर खुद ही तय कर लेंगे...ये लिखने की वजह है, कि आखिर कबीर सिंह चाहिए किसे...कौन चाहेगा कि उसका कबीर सिंह जैसा बेटा हो, जिसे गुस्सा काबू करना नहीं आता हो। कौन चाहेगा कि उसका कबीर सिंह जैसा भाई हो...जो अपने बड़े भाई पर हाथ उठा देता हो...कौन वो लड़की होगी जो चाहेगी कि उसका कबीर सिंह जैसा बॉयफ्रैंड या पति हो जो लड़की जिसे वो प्यार करता है उसे अपनी प्रॉपर्टी समझता हो...और खुद से अलग उस लड़की का वजूद ही नहीं मानता हो...इंटरवल से पहले कबीर सिंह का क्यारा को थप्पड़ मारकर ये कहना कि तुम जो भी हो मेरी वजह से हो, कहना अखरता है...हो सकता कुछ लड़कियों को इस तरह के प्रेमी पसंद आते हों...जो लड़की को मारकर अपने प्यार का सबूत देते हों...वैसे प्यार तो कोई भी कर लेता है लेकिन इज़्ज़त देने वाले कम ही मिलते हैं।

एक सलाह उन नए 'कबीरों' को जो फिल्म देखकर कबीर सिंह जैसा बनने की सोच रहे होंगे...कि कबीर सिंह सिर्फ पर्दे पर देखने के लिए ही है, बस रील लाइफ में ही अच्छा लगता है, रीयल लाइफ में कबीर सिंह ना होता है और ना होना चाहिए...फिल्म के अंत में कबीर सिंह भी सुधर जाता है तो अगर आखिर में सुधरना ही है तो क्यों कबीर सिंह बनकर अपनी जिंदगी का कुछ खूबसूरत हिस्सा खराब करना। अब अंत में इस फिल्म से जुड़ी सबसे खूबसूरत चीज... और वो हैं दादी जो बेहद लाउड फिल्म में ठंडी हवा के झोंके की तरह आती हैं...और उनकी एक बात जो फिल्म देखकर निकलने के बाद से अब तक याद है..

''आप किसी को खुश करने की कोशिश में उसका दुःख नहीं बाँट सकते...हर किसी को अपने कष्ट खुद ही सहने पड़ते हैं''